जब से बुद्धिजीवी वर्ग में राजनीति ने क्या प्रवेश कर लिया है और इसकी सुगंध पाकर बुद्धिजीवी भी आपस में घमासान करने लगे है . इन्ही मतभेदों के चलते हिंदी के प्रसिद्द कहानीकार और "पहल" पत्रिका के संपादक ज्ञान रंजन ने प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस) की प्राथमिक सदस्यता और अध्यक्ष मंडल से इस्तीफा दे दिया है . संघठन द्वारा जनसंस्कृति मंच के लेखक कृष्णमोहन को पहले से ही बाहर का रास्ता दिखा दिया गया था .
छत्तीसगढ़ में विगत दिवस हुए एक समारोह में इस विवाद की शुरुआत हुई थी . हरिशंकर परसाई और गजानन माधव मुक्तिबोध के मित्र रहे प्रमोद शर्मा की स्मृति में रायपुर में आयोजित कार्यक्रम में प्रदेश के मुख्यमंत्री उपस्थित रहे और इस दौरान जनवादी लेखक संघ जनसंस्कृति मंच और प्रलेस के कई लेखक उपस्थित थी .
इस समारोह का राजनीतिकरण होता देखकर बुद्धिजीवी वर्ग में हड़कंप की स्थिति पैदा हो गई और आपस में घमासान हो गई . कहा यह जाता है की प्रलेस के राजनीतिक पतन के विरोध में ज्ञानरंजन द्वारा इस्तीफा दिया गया है और वे इस तरह के राजनीतिक समारोहों में लेखको और बुद्धिजीवी वर्ग के उपस्थित होने का पुरजोर विरोध करते है . उन्होंने दो टूक शब्दों में साफ़ साफ़ कहा है की प्रगतिशील लेखक संघ के कुछ लेखक राजनीतिक दलों से सत्ता समीकरण बनाए हुए है जिससे उसके प्रगतिशील मूल्यों को अघात पहुंचा है .
एकलव्य ज्ञानरंजन जी के इस साहसपूर्ण कदम की सराहना करता है जिन्होंने इस्तीफा देकर यह साबित कर दिया की वे बुद्धिजीवी वर्ग के राजनीतिकरण के विरोधी है . बुद्धिजीवी वर्ग के राजनीतिकरण का प्रबल विरोध किया जाना चाहिए अन्यथा वह दिन दूर नहीं रहेगा की लेखको की कलम और लेखको का साहित्य राजनीतिज्ञों के पास गिरवी रखा होगा और लेखको और साहित्यकारों को राजनीतिज्ञों के नजरिये से साहित्य रचना गढ़ना पड़ेगा .
पूरी जिन्दगी चम्मचगिरी की राजनीति करने वाले प्रगतिशील लेखक संघ से आखिरकार बुढापें में राजनैतिक मतभेद होने की वजह क्या है। फिर भी देर आयद दुरुस्त आयद।
ReplyDeleteनारदमुनि
भोपाल
अब बुद्धिजीवी भी होने लगे दो फाड़ !
ReplyDeleteमुझे तो कभी एक ही नज़र नहीं आया भाई.
एक=एका
ReplyDeleteAAPKI BAAT SE MAIN BHI SAHMAT HUN ... HAR CHEEJ KA RAAJNEETI KARAN THEEK NAHI HAI .....
ReplyDeleteblogar jagat me aapka swagat hai ese hi likhte rahna.
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